आंखो का समंदर शायरी👁️👁️👀




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 उठती नहीं है आँख किसी और की तरफ, 

 पाबन्द कर गयी है किसी की नजर मुझे, 

 ईमान की तो ये है कि ईमान अब कहाँ, 

 काफ़िर बना गई तेरी काफ़िर-नज़र मुझे। 

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 महकता हुआ जिस्म तेरा गुलाब जैसा है, 

 नींद के सफर में तू एक ख्वाब जैसा है, 

 दो घूँट पी लेने दे आँखों के इस प्याले से, 

 नशा तेरी आँखों का शराब जैसा है। 

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 नशा जरूरी है ज़िन्दगी के लिए, 

 पर सिर्फ शराब ही नहीं है बेखुदी के लिए, 

 किसी की मस्त निगाहों में डूब जाओ, 

 बड़ा हसीं समंदर है ख़ुदकुशी के लिए। 

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 इश्क के फूल खिलते हैं तेरी खूबसूरत आँखों में, 

 जहाँ देखे तू एक नजर वहाँ खुशबू बिखर जाए। 

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 बिना पूछे ही सुलझ जाती हैं सवालों की गुत्थियाँ, 

 कुछ आँखें इतनी हाज़िर-जवाब होती हैं। 

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 तेरी आँखों की तौहीन नहीं तो और क्या है यह, 

 मैंने देखा तेरे चाहने वाले कल शराब पी रहे थे। 

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 क्या कहें, क्या क्या किया, तेरी निगाहों ने सुलूक, 

 दिल में आईं दिल में ठहरीं दिल में पैकाँ हो गईं। 

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 जब भी देखूं तो नज़रें चुरा लेती है वो, 

 मैंने कागज़ पर भी बना के देखी हैं आँखें उसकी। 

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 यह मुस्कुराती हुई आँखें 

 जिनमें रक्स करती है बहार, 

 शफक की, गुल की, 

 बिजलियों की शोखियाँ लिये हुए। 

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 इतने सवाल थे मेरे पास कि 

 मेरी उम्र से न सिमट सके, 

 जितने जवाब थे तेरे पास सभी 

 तेरी एक निगाह में आ गए। 

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 ऐ वाइज़-ए-नादाँ करता है 

 तू एक क़यामत का चर्चा, 

 यहाँ रोज़ निगाहें मिलती हैं 

 यहाँ रोज़ क़यामत होती है। 

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 उस की आँखों में नज़र आता था 

 सारा जहाँ मुझ को, 

 अफ़सोस उन आँखों में कभी 

 खुद को नहीं देखा मैंने। 

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 उस घड़ी देखो उनका आलम 

 नींद से जब हों बोझल आँखें, 

 कौन मेरी नजर में समाये 

 देखी हैं मैंने तुम्हारी आँखें। 

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 तुम्हीं कहते थे कि यह मसले 

 नजर मिलने से सुलझेंगे, 

 नजर की बात है तो फिर 

 यह लब खामोश रहने दो। 

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 अगर कुछ सीखना ही है, 

 तो आँखों को पढ़ना सीख लो, 

 ​वरना ​लफ़्ज़ों के मतलब तो, 

 ​हजारों निकाल लेते है। 

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 जाने क्यों डूब जाता हूँ हर बार इन्हें देख कर, 

 इक दरिया हैं या पूरा समंदर हैं तेरी आँखें। 

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 निगाहों से कत्ल कर दे न हो तकलीफ दोनों को, 

 तुझे खंजर उठाने की मुझे गर्दन झुकाने की। 

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 बहुत बेबाक आँखों में ताल्लुक टिक नहीं पाता, 

 मोहब्बत में कशिश रखने को शर्माना जरूरी है। 

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 मैं डर रहा हूँ तुम्हारी नशीली आँखों से, 

 कि लूट लें न किसी रोज़ कुछ पिला के मुझे। 

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 साकी को गिला है कि उसकी बिकती नहीं शराब, 

 और एक तेरी आँखें हैं कि होश में आने नहीं देती। 

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 सुबह तो हो गई पर ये अभी आँख भारी है, 

 ख्बाव कोई नशे सा अब तक आँखों में है। 

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 एक सी शोखी खुदा ने दी है हुस्नो-इश्क को, 

 फर्क बस इतना है वो आंखों में है ये दिल में है। 

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 उसकी कुदरत देखता हूँ तेरी आँखें देखकर, 

 दो पियालों में भरी है कैसे लाखों मन शराब। 

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 मस्त आंखों पर घनी पलकों की छाया यूँ थी, 

 जैसे कि हो मैखाने पर घरघोर घटा छाई हुई। 

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 लोग कहते हैं जिन्हें नील कंवल वो तो क़तील, 

 शब को इन झील सी आँखों में खिला करते है। 

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 देखा है मेरी नजरों ने 

 एक रंग छलकते पैमाने का, 

 यूँ खुलती है आंख किसी की 

 जैसे खुले दर मैखाने का। 

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 आँखों में हया हो तो 

 पर्दा दिल का ही काफी है, 

 नहीं तो नक़ाब से भी होते हैं, 

 इशारे मोहब्बत के। 

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 तेरी आँखों के जादू से 

 तू ख़ुद नहीं है वाकिफ़ 

 ये उसे भी जीना सिखा देती हैं 

 जिसे मरने का शौक़ हो। 

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 कोई आँख जैसे कोहरे में दबी-दबी सी चमके, 

 तेरी झिलमिलाती आँखों में अजीब सा शमा है। 

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 मैं खुदगर्ज़ हूँ इतना कि बस यही चाहूँ, 

 रहें हमेशा मेरी मुन्तज़िर तेरी आँखें। 

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 सिर्फ आँखों को देख के कर ली उनसे मोहब्बत, 

 छोड़ दिया अपने मुक़द्दर को उसके नक़ाब के पीछे। 

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 क्या कशिश थी उस की आँखों में मत पूछो. 

 मुझ से मेरा दिल लड़ पड़ा मुझे यही चाहिये? 

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 जीना मुहाल कर रखा है मेरी इन आँखों ने, 

 खुली हो तो तलाश तेरी बंद हो तो ख्वाब तेरे। 

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